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Tuesday, January 10, 2012

kavita by amir khusro

गौरी सोवै  सेज पर, और मुख पर डारे केस 
चल खुसरो घर आपने , रैन भई सब देस 
जब यार देखा नैन  भर , दिल की गयी  चिन्ता उतर 
ऐसा नहीं कोई  अजब , राखे उसे समझाए कर 
तू तो हमारा यार है , तुझ पर हमारा प्यार है 
तुझ दोस्ती बिसयार है , इक  शब मिलो तुम आय कर 
खुसरो कहे बातें , गजब  दिल में न लावे  कुछ  अजब 
कुदरत खुदा की है  अजब , जब जीव दिया गिल लायकर
जेहाले -मिस्की मकुन  तगाफूल , दुराए  नैना बनाए  बतियाँ
की ताबे - हिजराँ  न  दारम ऐ  जौ , न  लिह्य काहे लगाए  छतिया
शबाने - हिजराँ दराज वो चूँ , जुल्फे  रोजे -वस्लत चू उम्र कोताही  
सखी पिया को जो मै न देखूँ , तो कैसे काटूँ  अँधेरी  रतियाँ 
चूँ शमय  सोंजा  चूँ  जर्रा हैरा , जेमेंहरे -आमह वगशतम आखिर 
न नींद  नैना , न अंग चैनां  , न आप आवे , न भेजै पतियाँ 

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